hayate otsu
China




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अंधकार के सिंहासन पर बैठा, मैं अनуг्रह की लौ के बिना भटकता हूँ, जहाँ समय स्वयं अपने नाम को भूल चुका है।

यहाँ, इस विस्मृत भूमि में, जहां सूर्य रक्त से रंगा है और चाँद टूटे हुए दर्पण की भांति आकाश को चीरता है, केवल वे ही टिकते हैं, जिन्होंने मृत्यु को अपना गुरू माना। रक्त और राख से बुने पथ पर मैं चलता हूँ, हर कदम पर सन्नाटे की दहाड़ सुनता हूँ। ये शापित भूमि मृत देवताओं के स्वप्नों से बनी है, और यहाँ चेतना मात्र एक अभिशाप है, जो अपने चंगुल में रखती है उन सभी को, जो इस श्रापित धरती पर सांस लेने का दुस्साहस करते हैं।

मैं वो हूँ, जिसने अपने नाम की प्रतिध्वनि अंधकार को दे दी, जिससे नियति ने स्वयं मुँह मोड़ लिया। मेरी आत्मा पर धधकती अग्नि की छाया पड़ी है, और मेरे मार्गदर्शन के लिए कोई तारा नहीं। केवल शस्त्रों की चमक और ध्वनि मेरे संगी हैं, केवल युद्ध और विस्मृति मेरी धरोहर।

जो मेरे मार्ग पर आएंगे, उन्हें केवल पीड़ा मिलेगी। वे जो मित्रता की चाह में बढ़ेंगे, उनकी हड्डियाँ मेरी छाया में विलीन हो जाएँगी। यहाँ करुणा नहीं, केवल शक्ति है, और शक्ति का नियम एक ही है—जो गिरा, वह माटी में मिल गया।

यहाँ समय नहीं चलता, केवल अंधकार बढ़ता है। आशा की कोई लौ नहीं, केवल रक्त से सजी हुई कहानियाँ हैं, जो उन नामहीनों ने लिखी हैं, जो अब भूतों की तरह इन कंटीले पथों पर भटकते हैं।

मैं अंतिम गूँज हूँ उन चीखों की, जो अब मौन में विलीन हो चुकी हैं। मैं छाया हूँ उस महल की, जिसे देवताओं ने धूल में मिला दिया। मैं अनश्वर नहीं, परंतु नश्वरता ने भी मुझे अपनाने से इंकार कर दिया।

इस श्रापित भूमि में मैं ही काल हूँ, मैं ही प्रारब्ध।


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